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Madhyastham, Sulah Tatha Vaikalpik Vivad Nivaran Vidhi (Law of Arbitration, Conciliation and Alternative Dispute Resolution in Hindi)
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Madhyastham, Sulah Tatha Vaikalpik Vivad Nivaran Vidhi (Law of Arbitration, Conciliation and Alternative Dispute Resolution in Hindi)

Edition: 8th Edition, 2026
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Madhyastham, Sulah Tatha Vaikalpik Vivad Nivaran Vidhi (Law of Arbitration, Conciliation and Alternative Dispute Resolution in Hindi) 0 Reviews | Write A Review
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Product Details:

Format: Paperback
Pages: 469 pages
Publisher: Central Law Agency
Language: Hindi
ISBN: 9789392140846
Dimensions: 23.8 X 15.5 X 1.8 CM
Publisher Code: 9789392140846
Date Added: 2026-08-18
Search Category: Textbooks,Hindibooks
Jurisdiction: Indian

Overview:

इसमें संदेह नहीं कि माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम के विगत दो दशक के व्यावहारिक प्रयोग एवं प्रवर्तन से भारत में विवादों के त्वरित निपटारे हेतु एक सहज, सरल एवं स्वस्थ वैकल्पिक प्रणाली विकसित हुई है जिसकी सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यह है कि इससे न्यायालयीन कार्य-बोझ को कम करने के साथ-साथ विधि के विलंब को कम करने में भी पर्याप्त सहायता मिली है।

सन् 1996 के माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम का मुख्य प्रयोजन यह था कि माध्यस्थम् एवं सुलह कार्यवाहियों के माध्यम से पक्षकारों की स्वायत्तता को सुनिश्चित करते हुए इसमें न्यायालयीन हस्तक्षेप को यथासंभव न्यून रखा जाए तथा संस्थागत माध्यस्थम् को प्रोत्साहित किया जाए। तथापि अधिनियम के विगत वर्षों के क्रियान्वयन से यह अनुभव किया गया कि इसमें अभी भी कुछ कमियां विद्यमान थीं। इनके निवारण हेतु भारत सरकार ने सन् 2003 में माध्यस्थम् और सुलह (संशोधन) विधेयक तैयार करके उस पर संबंधित संस्थाओं, न्यायविदों, विधि-विशेषज्ञों तथा वाणिज्यिक व्यवसायियों एवं उद्यमियों से सुझाव आमंत्रित किये ताकि उन पर विचार करके अधिनियम को संशोधित रूप में पारित किया जा सके। तथापि अनेक कारणों से यह विधेयक वर्षों तक संसद में लम्बित पड़ा रहा। इसे संशोधित रूप में मई 2015 में पुन: संसद में प्रस्तुत किया गया तथा अन्ततोगत्वा यह माध्यस्थम् तथा सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2015 (2016 का 3) के रूप में पारित होकर दिनांक 23 अक्टूबर, 2015 से प्रवृत्त हुआ।

सन् 2015 का संशोधित अधिनियम प्रवृत्त होने के बावजूद इसे अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से सन् 2019 में मूल माध्यस्थम् तथा सुलह अधिनियम, 1996 के कतिपय प्रावधानों को परिष्कृत करते हुए इनमें सुधार किये गए ताकि भारत को एक विकसित माध्यस्थम् केन्द्र के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया जा सके और घरेलू तथा अन्तर्राष्ट्रीय कारोबारी तथा कंपनियां अपने वाणिज्यिक विवादों को सुलझाने हेतु भारत की ओर आकृष्ट हों। इस संशोधन अधिनियम का एक उद्देश्य यह भी था कि माध्यस्थम् प्रणाली को समयबद्ध और कम खर्चीली व्यवस्था के रूप में विकसित किया जा सके।

तत्पश्चात, माध्यस्थम् विधि में सन 2021 में पुन: संशोधन किया गया जिसका केन्द्र बिंदु माध्यस्थम् कार्यवाही और प्रक्रिया में कपट और भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त करके इसे एक साफ-सुथरी और व्यावसायिक व्यवस्था के रूप में विकसित करना था।

उपरोक्त सभी संशोधनों के होते हुए भी विगत दशकों से विधि व्यवसायियों, न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं, माध्यस्थम् विशेषज्ञों तथा संबंधित पणधारियों की ओर से एक पृथक् एवं स्वतंत्र मध्यकता विधि की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी। इसके प्रति गंभीरता से विचार करते हुए केन्द्रीय सरकार ने सन् 2023 में संसद में मध्यकता अधिनियम, 2023 पारित कराया जो दिनांक 9 अक्टूबर, 2023 से प्रवृत्त हुआ। इस अधिनियम के पारित होने के परिणामस्वरूप सभी सुलह-कार्यवाहियां जो माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 के अन्तर्गत संचालित होती थीं, अब मध्यकता अधिनियम, 2023 (Mediation Act, 2023) के अन्तर्गत मध्यकता के संदर्भ के रूप में समझी जाएंगी। अत: अब 'सुलह' और 'मध्यकता' का अदल-बदल कर उपयोग किया जा सकेगा ताकि सिविल, वाणिज्यिक, कुटुंबीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान हेतु अपनाई जाने वाली प्रक्रिया, सरल और पणधारियों के लिए आसान हो।

माध्यस्थम् विधि में हुए इन सभी संशोधनों तथा बदलावों को पुस्तक के इस संस्करण में यथास्थान समाविष्ट करते हुए इस कृति को अद्यतन रूप में प्रस्तुत करने का यथासंभव प्रयास किया गया है।

इस पुस्तक के प्रति पाठकों में विशेष रुचि को ध्यान में रखते हुए लेखक ने प्रस्तुत अष्टम् संस्करण में माध्यस्थम् और सुलह विधि से संबंधित सभी अद्यतन निर्णीत-वादों को यथा-स्थान समाविष्ट करते हुए विषय वस्तु को अधिक स्पष्ट एवं बोधगम्य बनाने का भरसक प्रयास किया है। वर्तमान समय में माध्यस्थम् एवं सुलह तंत्र के अतिरिक्त विवादों के त्वरित निपटारे हेतु अन्य वैकल्पिक तरीके अपनाए जाने पर विशेष बल दिया जा रहा है ताकि औद्योगिक विकास तथा निरंतर बढ़ते हुए अन्तर्राष्ट्रीय वाणिज्य एवं व्यापार के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले विवादों का निपटारा आपसी सुलह और समझौते द्वारा हो सके। इन विभिन्न वैकल्पिक विवाद-निवारक तकनीकों का विवेचन पुस्तक के भाग V में सविस्तार किया गया है। पुस्तक की पूर्णता की दृष्टि से इसमें संदर्भ ग्रंथ-सूची तथा निर्णीत वादों की तालिका का भी समावेश है जो अधिक जिज्ञासु पाठकों के लिये विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होगी।

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