यह पुस्तक दीवानी वाद विचारण पर आधारित एक समग्र एवं व्यावहारिक हिंदी मार्गदर्शिका है, जिसे उच्चतर न्यायिक सेवा से सेवानिवृत्त वरिष्ठ न्यायाधिकारी श्री रामायण शर्मा द्वारा लिखा गया है। वर्ष 2026 का यह प्रथम संस्करण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत दीवानी वादों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया, सिद्धांत एवं मूल तत्त्वों का सुव्यवस्थित विवेचन प्रस्तुत करता है। लेखक ने अपने दीर्घ न्यायिक अनुभव के आधार पर वाद की स्थापना से लेकर निर्णय, डिक्री निष्पादन तथा अपीलीय उपायों तक की संपूर्ण प्रक्रिया को सरल एवं स्पष्ट भाषा में समझाया है।
मुख्य विशेषताएँ:
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अनुसार दीवानी वाद के प्रत्येक चरण का क्रमबद्ध एवं सरल हिंदी में विवरण
- वादपत्र एवं लिखित बयान से संबंधित जटिलताओं तथा प्रभावी अभिवचन प्रतिरक्षा का व्यावहारिक विश्लेषण
- वाद बिंदुओं के निर्धारण, साक्ष्य लेखन एवं प्रस्तुतीकरण तथा अंतिम तर्कों की विस्तृत व्याख्या
- निर्णय, डिक्री तथा डिक्री निष्पादन प्रक्रिया का स्पष्ट एवं व्यवहारोन्मुख विवेचन
- अपील, रिविजन एवं रिव्यू के बीच अंतर को सरल शब्दों में तुलनात्मक रूप से स्पष्ट किया गया
- निचली अदालत से जिला न्यायाधीश स्तर तक के न्यायिक अनुभवों का समावेश
- दीवानी न्यायालयों में कार्यरत अधिवक्ताओं एवं न्यायाधीशों के समक्ष आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों पर विशेष बल
- दीवानी वाद विचारण की प्रक्रिया को सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक संतुलन के साथ प्रस्तुत करने वाली उपयोगी कृति
यह पुस्तक अधिवक्ताओं, नव-नामांकित अधिवक्ताओं, न्यायिक सेवा अभ्यर्थियों, न्यायिक अधिकारियों, विधि विद्यार्थियों एवं विधि शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है, जो हिंदी भाषा में दीवानी वाद विचारण की संपूर्ण एवं व्यावहारिक समझ विकसित करना चाहते हैं।