भारतीय संविधान एक परिवर्तनकारी दस्तावेज़ है, जो विधायी प्रावधानों तथा न्यायिक निर्णयों के माध्यम से समयानुसार परिवर्तन के लिए सक्षम एवं अनुकूल है। इस संदर्भ में, यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि वर्ष 1950 में इसके प्रवर्तन से लेकर वर्तमान समय तक इसकी विषय-वस्तु और साहित्य को आकार देने वाले विभिन्न सिद्धांतों, संशोधनों तथा न्यायिक प्रतिपादनों का सम्यक् अध्ययन और समझ विकसित की जाए।
डॉ. जे. एन. पाण्डेय की कृति "भारत का संविधान" को एक प्रामाणिक एवं प्रतिष्ठित ग्रंथ के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो भारतीय संविधान की मूलभूत अवधारणाओं का स्पष्ट, सुव्यवस्थित तथा विशद विश्लेषण प्रस्तुत करती है। वर्ष 1969 से निरंतर प्रकाशित हो रहा यह ग्रंथ विधि के विद्यार्थियों, प्रशासनिक अधिकारियों, न्यायिक तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों, और उन सामान्य पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो भारतीय संवैधानिक विधि के क्षेत्र में अध्ययन एवं अनुसंधान की अभिरुचि रखते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
- पुस्तक को स्पष्ट, सुसंगत एवं विस्तृत शैली में प्रस्तुत किया गया है, जो इसे विद्यार्थियों और पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी तथा सहज रूप से बोधगम्य बनाती है।
- संविधान के महत्व तथा उसके क्रमिक विकास का व्यवस्थित एवं विश्लेषणात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है- 1600 ई. में औपनिवेशिक काल के प्रारम्भ से लेकर वर्तमान समय तक - जिससे वर्ष 1950 में भारतीय संविधान के निर्माण तक की संपूर्ण विधायी पृष्ठभूमि का समग्र दृष्टिकोण प्राप्त होता है।
- इसमें महत्वपूर्ण, नवीनतम तथा अन्य प्रासंगिक न्यायिक निर्णयों का समावेश किया गया है, जो ग्रंथ की समकालीन प्रासंगिकता को और सुदृढ़ बनाते हैं।
- संवैधानिक विधि के क्षेत्र में समय-समय पर हुए परिवर्तनों तथा संशोधनों को समाहित किया गया है।